"सच्ची समृद्धि"
तिजोरी भरी हो नोटों से, उसे अमीर न मानो,
घर के आँगन में जहाँ प्रेम बसे, उसे ही धनवान जानो।
सोना-चाँदी कितना भी हो, दीवारें ऊँची हों,
पर अगर रिश्तों में खटास है, तो वो महल भी सूने हों।
असली समृद्धि वो है, जहाँ मुस्कान गूंजती है,
जहाँ बहू-बेटियाँ हँसती हैं, इज्जत से पूंजती है।
जहाँ सुरक्षा का आँचल हो, सम्मान का उजियारा,
जहाँ स्नेह की छाँव तले, हर सदस्य का गुजारा।
धन से तो बस सुविधा मिले, फ्रिज, गाड़ी, बंगला,
पर घर की रौनक नहीं बिकती, न मिलता रिश्तों का झंगला।
रिश्तों की मिठास खरीदी, बाजार में नहीं जाती,
सच्ची हँसी के दाम, किसी तिजोरी में नहीं आती।
ये पूँजी संस्कारों से बनती, प्रेम की नींव पर टिकी,
परस्पर सम्मान की ईंटों से, दीवार ये मजबूत सजी।
जिस घर में बेटी बेफिक्र, बहू भी गर्व से जीए,
उसी घर का नाम सबसे बड़ा, सबसे ऊँचा कहलाए।
इसलिए तिजोरी से पहले, मन की तिजोरी भर लो,
प्रेम, अपनापन, सम्मान के, सिक्के उसमें धर लो।
क्योंकि आखिर में यही बचता, यही साथ में जाता,
धन तो यहीं रह जाता है, संस्कार ही आगे आता।
यही घर सबसे धनवान है, यही परिवार महान है,
जहाँ रौनक, रिश्ते और मुस्कान — तीनों का सम्मान है। 🌿
- जगदीश प्रसाद शर्मा