"सच्चा अपना मित्र"
सच्चा अपना मित्र वही जो तूफां में भी साथ दे,
धूप हो या काली रात, कंधे से कंधा मिला के चले।
भीड़ में तालियाँ बजाने वाले तो हजार मिलेंगे,
पर गिरते वक्त जो हाथ बढ़ाए, वही अपने कहलाएँगे।
नाम के रिश्ते हर गली में, दिखावे के मेले हैं,
परख होती है मित्र की, जब जेब और हौसले खाली हैं।
खुशी में सब अपने बनते, गम में सन्नाटा छा जाए,
जो उस सन्नाटे में बोले "मैं हूँ", वही सच्चा साया है।
वो मीठी झूठ नहीं बोलेगा, कड़वा सच भी कह देगा,
बुरा कभी न सोचेगा, राह भटके तो रोक लेगा।
पीठ पीछे तेरी इज्जत बढ़ाए, सामने आईना दिखाए,
निंदा की आंधी में भी, तेरे नाम का दीप जलाए।
स्वार्थ का धुआं जब उड़े, तब चेहरों से नकाब गिरते हैं,
मुखौटे उतर जाते हैं, और रिश्तों के रंग निखरते हैं।
सच्चा मित्र कोई सौदा नहीं, न कोई जरूरत का मोल,
वो ईश्वर की दी हुई दौलत है, जो किस्मत से मिलती है बोल।
उसके होने से लगता है, आधी जंग तो जीती है,
एक आवाज़ से लगता है, सारी दुनिया छोटी है।
ना वो सगा होता है, ना खून का रिश्ता रखता है,
फिर भी सीने में धड़कता है, और हर दुआ में बसता है।
दोस्त नहीं वो, एहसास है, दुआओं का उत्तर है,
सच्चा अपना मित्र मिल जाए, तो जीवन सार्थक होता है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा