यह युद्ध की कथा नहीं, यह त्याग की गाथा है,
महलों का सुख छोड़ वन को जाना मेरी व्यथा है।
जनक की लाडली थी, पर चुना मैंने कर्तव्य को,
चौदह बरस वन में, संग निभाया दायित्व को।
सत्ता से बड़ा था मेरे लिए प्रेम और साथ,
राम के कदमों में ही था मेरे जीवन का प्रात।
फिर आई अग्नि-परीक्षा लंका की अशोक वाटिका में,
रावण के प्रलोभन ठुकराए, धैर्य था मेरी शक्ति में।
निष्ठा अडिग रही, मन नहीं डिगा जरा भी,
बंदी तन था मेरा, पर मन उड़ता रहा यहाँ-वहाँ भी।
युद्ध के बाद जब शंका ने घेरा समाज को,
बिना द्वेष अग्नि में कूदी, सौंपा सबूत आज को।
पवित्रता की गवाही मांगी दुनिया ने बार-बार,
फिर भी मौन रही, सहा हर वार।
गर्भवती थी जब फिर भेजा गया वन की ओर,
अकेले पाला लव-कुश को, बनी माँ एक छाँव-सी भोर।
आश्रम में शिक्षा दी, संस्कार दिए, मान बढ़ाया,
त्याग से ही एक नया संसार बसाया।
जब फिर कहा गया "सिद्ध करो" दरबार में,
तो धरती माँ को पुकारा, समा गई उसकी छाँव में।
यह समर्पण नहीं था हार, यह था स्वाभिमान,
जहाँ मर्यादा आहत हो, वहाँ मौन ही पहचान।
इसलिए ये रामायण सिर्फ विजय नहीं कहलाती,
यह एक स्त्री की चुप सहनशीलता की थाती है।
प्रेम, त्याग और धैर्य की अनंत परिभाषा है,
सीता की रामायण — एक अधूरी सी आशा है।
— जगदीश प्रसाद शर्मा