"राग ही जीवन"
संसार राग से चलता है, विराग से नहीं,
दीप जलता है तेल से, वायु से नहीं।
जब तक साँसों की माला चलती है,
तब तक मोह की गाँठ भी चलती है।
मोह न हो तो पाँव रुके, घर आँगन सूना हो जाए,
माँ की ममता, पिता का साया, सब बेमानी हो जाए।
बीज से वृक्ष, वृक्ष से छाया, रिश्तों का ये मेला,
मोह के धागे से ही तो बुना है जीवन का झमेला।
देखो संन्यासी भी तन को कैसे तज पाए,
पंचतत्व के इस पुतले को भोजन-पानी तो चाहिए।
भूख-प्यास भी माया, नींद भी माया,
इसलिए तो मार्ग में भी भिक्षा की थाली आया।
इसीलिए हमारे देव भी अकेले नहीं,
ब्रह्मा के संग सावित्री, विष्णु संग लक्ष्मी,
शंकर के संग पार्वती खड़ी है।
सृजन, पालन, संहार - तीनों को अर्द्धांगिनी मिली है,
क्योंकि राग के बिना सृष्टि की गाड़ी नहीं चली है।
हाँ, सच है एक दिन ऐसा भी आता है,
जब रिश्तों के मायने धुंधले पड़ जाते हैं।
महल-माया, मान-सम्मान सब पीछे छूट जाता है,
स्वजन खड़े रह जाते हैं, और बुलावा ऊपर से आता है।
तब न कोई बंधन काम आता, न कोई किनारा,
तब सिर्फ एक नाम ही वैतरणी का सहारा।
जिस नाम को जीते जी जपा था राग में रहकर,
वही नाम अंत में पार लगा देता है उतरकर।
इसलिए राग को मत कोसो, ये जीवन का नियम है,
मोह को मत त्यागो, ये साँसों का सलीका है।
राग में रहकर भी विराग सीख लो,
क्योंकि अंत में राग भी उसी में विलीन है।
--- जगदीश प्रसाद शर्मा, दिल्ली
स्वरचित मौलिक रचना