"मन-समंदर की लहरें"
हे ईश्वर, सुनो, विचार तो लहरें हैं,
मन के समंदर की गहरी गहरें हैं।
जैसे सागर में तरंगें उठती जाती हैं,
वैसे ही मन में सोचें उगती जाती हैं।
मैं इन लहरों को देखता द्रष्टा बनके,
तू साक्षी-स्वामी इस महासागर तन के।
तू देखता सब, मैं भी निहारता हूँ,
तेरी ही छाया में विचार संवारता हूँ।
एक विचार जो रोज मन में ठहरे,
वही आदत बन के जीवन में गहरे।
आदत से स्वभाव, स्वभाव से दृष्टि बनती,
दृष्टि से फिर तो पूरी सृष्टि बनती।
इसलिए प्रभु, मन में दिव्य को लाना है,
शुद्ध विचारों से जीवन सजाना है।
तेरी रचना क्या अद्भुत, क्या न्यारी,
लहर से विचार बने, लीला तुम्हारी।
ये तरंगें तन मन को छू जाती हैं,
कुछ तामसिक, कुछ राजसिक हो जाती हैं।
कुछ सात्विक बन शांति लाती हैं,
जो इन सबसे परे, वो दर्शन बन जाती हैं।
वेद ने भी यही मंगल गाया,
आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः आया।
तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु,
मेरा मन शिवमय, शुभमय वस्तु।
विचार मिटते नहीं, बदलते हैं,
शुद्ध होते हैं, संवरते हैं।
शुद्ध आहार, श्रेष्ठ संग से,
इन्द्रिय संयम, साक्षी रंग से।
इसलिए हे सर्वशक्तिमान, कृपा कर दो,
मेरे पुरुषार्थ में अनुग्रह भर दो।
मेरा अन्न पावन, इन्द्रियाँ पावन कर दो,
ताकि निर्मल विचार मन में भर दो।
इच्छा शांत कर, कर्म शुभ्र कर दो,
चित्त में मेरे दिव्यता भर दो।
साधना की अग्नि जला दो ऐसी,
मलिन संस्कार भस्म हो जाएं जैसी।
कुविचार जले, सुविचार पले,
तेरी ज्योति से मन के तिमिर टले।
मस्तिष्क में इतना तेज भर दो,
तेजस विचारों का मेघ भर दो।
ज्ञान को ऋतम्भरा प्रज्ञा बना दो,
दिव्य विचारों की गंगा बहा दो।
साक्षी भाव हृदय में जगा दो,
द्रष्टा बनूं, ऐसा वर लगा दो।
फिर तेरी कृपा से मैं क्या करूं,
दिव्य विचारों को बस देखता रहूं।
न पकड़ूं कुछ, न जकड़ूं कुछ,
बस देखूं, बस समझूं कुछ।
द्रष्टा बनकर स्थित हो जाऊं,
तेरी प्रणव ध्वनि में खो जाऊं।
अनाहत में डूब डूब जाऊं,
तू मुझमें, तुझमें ही मैं
पाऊं।
- जगदीश प्रसाद शर्मा