विज्ञापन

मैं साक्षी हूँ

Jagdish Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            "मैं साक्षी हूँ"
        
                                                    
                            

न मैं तन हूँ, न मन हूँ, न बुद्धि का विस्तार,
मैं तो शुद्ध चैतन्य हूँ, अमर, अविनाशी सार।
अष्टावक्र बोले जनक से, सुन ले ये रहस्य,
जान ले जो "मैं कौन" तो कट जाए भव का व्यसन।

जो दिखता है जगत में, वो माया का खेल है,
रूप रंग सब दृश्य हैं, तू केवल द्रष्टा बेल है।
संसार बदलता रहे, तू साक्षी बन देखता,
न लिप्त हो, न डूबे, तट पर खड़ा हंसता।

"मैं कर्ता हूँ" यही भ्रम, दुखों की जड़ कहाता,
छोड़ दे अहंकार को, तू मुक्त तुरंत हो जाता।
न योग कठिन, न व्रत-उपवास की जरूरत यहाँ,
बस तीव्र बोध चाहिए, समझ का एक दीप यहाँ।

विषय-वासना मोह-माया, सब बंधन के धागे,
अनासक्ति का दीप जले तो सारे बंधन भागे।
जिस क्षण तू जान गया, "मैं आत्मा हूँ पूर्ण",
उसी क्षण मिट गया भय, जीवन हुआ सम्पूर्ण।

न पाना है, न खोना है, न आना है न जाना,
जो था, जो है, जो रहेगा — वही तू है पहचाना।
इसलिए हे राजन! रुक मत, भटक मत,
अपने स्वरूप में ठहर जा, और मुक्त हो जा तट।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3562 कविताएं

View Profile