"झुकना ही ऊँचाई है"
कलम तभी सुंदर अक्षर लिख पाती
जब थोड़ा झुककर कागज पर चलती।
ठीक वैसे ही जीवन का भी सार है
जो झुकता है, वही ऊँचाई तक जाता है।
विनम्रता में वो शक्ति समाई
पत्थर को भी मोम-सा बना जाए।
धैर्य रखे जो हर तूफान में
वो मंजिल तक आखिर में पहुँच जाए।
सीखने का भाव जिसके मन में हो
वो हर दिन नया ज्ञान संजोए।
अहंकार तो रेत का घर है
छोटी सी हवा में खुद ही ढह जाए।
अहंकार इंसान को सबसे दूर करे
नम्रता दिलों में घर बना ले।
फल से लदा वृक्ष भी झुका करता
ज्ञान से भरा जन भी विनम्र रहता।
जितनी ऊँचाई मिले जीवन में
उतनी ही सरलता रखो अपने में।
बातों में मधुरता, व्यवहार में शीतलता
यही तो है महान व्यक्तित्व की पहचान।
झुकना कमजोरी कभी नहीं होती
झुककर ही तो डाली फल से लदती।
जो झुककर चलता है इस दुनिया में
वही सबसे ऊँचा कहलाता है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा