ईश्वर कौन है, कहाँ है?
पता नहीं उसका, न कोई तस्वीर है,
वो तो एक ऊर्जा है, जो सबमें वीर है।
न बांधो उसे मंदिर, मस्जिद, चर्च में,
वो तो बसता है, हर दिल के अर्श में।।
कोई कहे ब्रह्मा, विष्णु, महेश है,
कोई कहे अल्लाह, वही तो शेष है।
कोई कहे गॉड, कोई कहे राम,
सब नाम हैं उसके, एक ही है नाम।।
सृष्टि का रचयिता, वही पालनहार है,
कण-कण में व्यापक, वही तो सार है।
गीता कहे उसको, अजन्मा अनंत,
सबमें है, सबसे परे, वही भगवंत।।
पूछो कहाँ रहता, तो सुनो भाई,
हर जगह है वो, कहीं नहीं जुदाई।
पत्थर में, पानी में, फूलों की गंध में,
माँ की ममता में, और मन के द्वंद्व में।।
संतों ने कहा - बाहर मत खोजो,
तीर्थों के फेरे में, मत उलझो।
मंदिर के भीतर, नहीं वो रहता,
तुम्हारे ही भीतर, मौन वो कहता।।
कैसा दिखता है, ये प्रश्न पुराना,
न रंग है उसका, न रूप का ठिकाना।
वो तो निराकार है, अनादि अनूप है,
पर प्रेम से देखो, तो सगुण स्वरूप है।।
भक्त को दिखे वो, राम-सा प्यारा,
किसी को लगे कृष्ण, मुरली-वाला न्यारा।
किसी को दिखे शिव, भोला भंडारी,
भाव के जैसा, रूप धरे भारी।।
विज्ञान ने खोजा, पर पा न सका,
यंत्रों में ईश्वर, कभी आ न सका।
सबूत नहीं उसका, किसी प्रयोग में,
पर महसूस होता, हर संयोग में।।
ऋषियों ने जाना, ध्यान लगाकर,
भीतर ही पाया, आपा मिटाकर।
बाहर नहीं मिलता, वो तो अंदर है,
जब आईना साफ हो, तभी सुंदर है।।
- जगदीश प्रसाद शर्मा