"चित्त को मोड़ दे"
हे ईश्वर, ये तन दिया, ये मन दिया, ये चित्त भी दिया,
पर ये तीनों विषय-भोगों में ही उलझे रहे सदा।
क्योंकि परमानंद का स्वाद कभी चखा नहीं,
इसलिए कच्चे फल को ही अमृत समझा सदा।
सुना है वो आनंद अद्भुत है, अकथनीय है, अखंड है,
जैसे सागर में डूब जाए एक बूंद, फिर बूंद न रहे।
वैसा ही मिलन है तुझसे, जहाँ "मैं" मिट जाए,
और केवल तू ही तू शेष बचे।
हे कृपासिंधु, अब कृपा कर, इस मन को मोड़ दे,
जैसे नदियाँ भटक कर भी अंत में सागर को खोज लेती हैं।
जैसे पंछी शाम ढले अपने नीड़ की ओर लौट आते हैं,
वैसे ही मेरा चित्त तेरे चरणों की ओर दौड़ने लगे।
बल दे मुझे, तेरे बताए वेद-पथ पर चलने का,
जहाँ हर कदम पर धर्म का दीपक जलता हो।
दे निष्ठा धर्म में, दे स्थिति सत्य में,
दे रुचि उस तप में, जहाँ आत्मा निखरती हो।
काम के अंधकार से निकाल,
क्रोध की आग से बचा,
लोभ की दलदल से उबार,
और ज्ञान के प्रकाश में प्रतिष्ठित कर दे।
तब तक तपा मुझे, जब तक मैल न छूट जाए,
तब तक गढ़ मुझे, जब तक कुंदन न बन जाऊँ।
और एक दिन ऐसा आए,
कि मैं विषयों को न त्यागूँ,
विषय ही मुझे त्याग दें।
हे प्रभु, परमानंद की यात्रा लंबी सही,
पर तू साथ है तो मंजिल दूर नहीं।
बस इतनी दया कर,
कि मेरा चित्त तेरी ओर मुड़ जाए,
और फिर कभी न लौटे।
- जगदीश प्रसाद शर्मा