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बुद्ध के चार आर्य सत्य

Jagdish Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अनित्यम अनित्यम सर्वम अनित्यम,
        
                                                    
                            
बुद्ध बोले यही परम सत्यम।

जो आज फूल सा खिला है डाल पर,
कल वही झरेगा धूल में काल पर।
महल अटारी, सोना चांदी,
कुछ भी टिके नहीं, सब है आँधी।
जिसे तू नित्य समझकर लिपटता है,
वही बंधन बनकर तुझे कसता है।
अनित्य को जो नित्य माने,
वह भव सागर में ही भटके जाने।

क्षणिकम क्षणिकम सर्वम क्षणिकम,
पल पल में बदले जीवन क्षणिकम।

बिजली जैसी चमके ये काया,
क्षण में आई, क्षण में माया।
बचपन हँसा, जवानी आई,
बुढ़ापे ने फिर चादर बिछाई।
एक विचार उठा, एक विचार ढला,
क्षण क्षण में ही जग बदला।
क्षण को पकड़ने जो दौड़ेगा,
हाथ में उसके दुख ही आएगा।

शून्यम शून्यम सर्वम शून्यम,
मैं नहीं, मेरा नहीं, सर्वम शून्यम।

मैं हूँ, मेरा है, ये दो हैं फंदा,
इन्हीं दो शब्दों में उलझा है बंदा।
घट को फोड़ो तो भीतर शून्य है,
पट को देखो तो भीतर शून्य है।
शून्य का अर्थ अभाव नहीं,
शून्य तो है जहाँ स्वभाव नहीं।
जैसे बांसुरी शून्य से गाती,
वैसे ही आत्मा शून्य से मुक्ति पाती।

दुखम दुखम सर्वम दुखम,
तृष्णा में बंधा सर्वम दुखम।

जन्म भी दुख, जरा भी दुख है,
रोग, मरण, वियोग सब दुख है।
पाना चाहे, पाकर रोये,
खोना चाहे न, खोकर रोये।
क्यों है ये दुख, बुद्ध बताते,
अनित्य में नित्य खोजे जाते।
क्षणिक सुख को शाश्वत मानते,
शून्य में अहंकार को ठानते,
इसलिए ही प्राणी दुख पाते।

चार शब्द नहीं, ये चार दीप हैं,
अंधेरे मन के चार समीप हैं।

अनित्य जानो तो मोह घटेगा,
क्षणिक जानो तो क्रोध हटेगा,
शून्य जानो तो मैं मिटेगा,
दुख जानो तो चक्र कटेगा।

यही तो है बुद्ध का मध्यम ज्ञान,
न अति भोग, न अति त्याग महान।
बीच में चलो तो मुक्ति मिलेगी,
इसी शून्य में ज्योति खिलेगी।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
एक घंटा पहले
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