"अपने ही अनमोल हैं"
जब मन का झुकाव गैरों की ओर जाए
तब अपनों का प्यार भी बेगाना लगे।
उनका त्याग, उनकी ममता, उनका अपनापन
आँखों को धुंधला, दिल को पराया लगे।
गैरों की छोटी-सी बात भी बड़ी लगे
अपनों की हर अच्छाई भी सस्ती लगे।
कमियाँ पहाड़-सी और खूबियाँ धुंधली
यही भ्रम है जो रिश्तों को जुदा करे।
पर अनुभव कहता है, ये सुन लो तुम
कठिन घड़ी में कौन साथ निभाता है।
जिसने बिना स्वार्थ के हाथ थामा था
वही आँसू पोंछकर मुस्कान लौटाता है।
क्षणिक आकर्षण की मीठी बातों में
अपनों की कद्र को मत घटाना।
चमक बाहर की पलभर की होती
अपनों का प्रेम सदियों तक निभता है।
सच्चे अपने अनमोल हीरे जैसे
उनकी जगह कोई दूसरा नहीं ले सकता।
धूप में छाया देने वाला वृक्ष वही
जिसे हमने अक्सर साधारण समझा था।
इसलिए रिश्तों की डोर को मजबूत रखो
भ्रम के झोंके से इसे मत टूटने दो।
क्योंकि गैर ताली देकर चले जाते हैं
और अपने तालीफ बजाकर संभालते हैं।
- जगदीश प्रसाद शर्मा