"अपने आप में"
स्वाभिमान रखो, पर अभिमान न हो
अहंकार दीमक है, खुद को ही खा जाए।
जो लकड़ी अंदर से खोखली हो जाए
वो ऊँची दिखे भी, तो गिर ही जाए।
दूसरों को सलाह देना सबको आता
खुद क्या करना है, ये कोई न बताता।
बड़ी-बड़ी बातों से समझ नहीं आती
छोटी-छोटी बात समझे वही ज्ञानी कहलाती।
उम्मीद वो दीप है अंधेरे में जलता
हालात खराब हों, फिर भी मन को बहलाता।
वो शक्ति है जो गिरकर भी उठाती
टूटे सपनों में भी आस जगाती।
पैसा वही जो जेब में अपना हो
ताकत वही जो बाँहों में अपना हो।
अपने वही जो साथ खड़े हों
बाकी सब तो बस मेले के लोग हों।
तुलना की दौड़ में मत पड़ो कभी
दूसरे से बड़ा मानो तो श्रेष्ठता की ग्रंथि।
दूसरे से छोटा मानो तो हीनता आ जाए
दोनों ही बंधन हैं, आत्मा को दबा जाए।
इन दोनों से परे होकर जियो तुम
अपने आप में रहो, अपने कर्म में रहो।
मनुष्य की कुछ मर्यादाएं बनी हैं
उनको निभाना ही सच्ची समझदारी है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा