चंचल, चपल, मृगतृष्णा समान होती है मानव की ये जीवन-डोर,
होकर स्वच्छंद, मदमस्त निरंतर, मन की बगिया में करती है शोर।
क्षण भर भी नहीं करती स्वयं आत्म-अवलोकन, वह अंधी दौड़ में,
भौतिकता के अंतर्द्वंद्व में फंसती ही जाती है वह होड़ ही होड़ में।
जगती मृग-मरीचिका तो एक अंध-तृष्णा, जन्म लेती मानव-मन में,
होता दूर स्वयं भाव से, एक ही अंतर्द्वंद्व रहता है उसके जीवन में।
स्नेह, माधुर्य एवं अपनत्व खो जाता है, उसका तृष्णापूर्ण आशा में,
बन चक्षुहीन, जीवन में संघर्ष करता रहता वह इसी अभिलाषा में।
ज्ञान रूपी जल तो उसे मिलता नहीं, फंसता है मोह के अहंकार में,
भवसागर के कंटक-पथ को पाकर, वह खोता मोह के अंधकार में।
कहते शास्त्र सदा ही, सभी जीवन-पथ को यदि सुगम बनाना है,
आत्मानुभवों को सुपथ मानकर, सद्धर्म पर स्वयं को चलाना है।
— जगदीश हाड़ा