तुम्हारा कोलाहल, शोर-शराबा नहीं सुनेंगे।
हम सच बोलेंगे, तुम्हारे कान वही सुनेंगे।
मजाक हमारी अच्छाई का बना रहे, तो सुन लो।
वक्त तुम्हारा भी आएगा, हम जहां होंगे वहीं सुनेंगे।
इस अमीर-ए-शहर में इमान की दुकां नहीं मिलेगी।
खोलते रहना तुम झूठ की परतें, हम सही सुनेंगे।
न दौलत से, न ताकत से, न झूठे चारण से।
हम जीतेंगे हिम्मत से, एक दिन सब यही सुनेंगे
आदत है तुम्हारी, हमें गिरते हुये देखना।
जब चर्चे होंगे उड़ान के, तुम्हारे कान वही सुनेंगे।
मिसाल अपनी मेहनत की, बच्चों को मत दे देना।
तुम जोर से चाहे जितना बोलो, वो नहीं सुनेंगे।
... जगदीश चंद्र कापड़ी