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सपनों के लिए लड़ती महिला

Jagdish chandra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब कभी मैं
        
                                                    
                            
आकाश की ओर
देखा करती थी,
उसका फैला हुआ
नीला-नीला विस्तार
मुझे डराता था।

उसकी अनंत ऊँचाइयाँ
मेरे छोटे-से सपनों पर
हँसा करती थीं,
मैं सोचती थी—
क्या मैं भी कभी
इतनी ऊँचाई छू पाऊँगी?

न जाने कब से
ऐसा कैसे हो गया
कि वही आकाश
अब मुझे डराता नहीं,
उसके आँचल में
मेरे सपने पलते हैं,
उसकी ऊँचाइयाँ
मुझे बुलाती हैं।

अब मैं
इन ऊँचाइयों से
प्रेरणा लेती हूँ,
गिरने से नहीं डरती,
हारने से नहीं डरती,
क्योंकि मैंने
अपने सपनों के लिए
लड़ना सीख लिया है।

कहने वाले कहते रहे—
“तुमसे नहीं होगा।”
मैंने हर बार
अपने भीतर से कहा—
“क्यों नहीं होगा?”
जिस चौखट ने
मेरे कदम रोकने चाहे,
उसी चौखट से
मैंने अपनी राह बनाई है।

जिस समाज ने
मेरे सपनों को छोटा समझा,
उसी समाज के सामने
मैंने अपनी पहचान बनाई है।
मैं सिर्फ़ किसी की बेटी,
किसी की पत्नी या माँ नहीं,
मैं अपने सपनों की
खुद एक कहानी हूँ।

मेरी आँखों में जो सपना है,
वह मेरी ज़िद भी है,
मेरी मंज़िल भी है।
अब जो आकाश
कभी डराता था मुझे,
आज उसी की ओर
मैं उड़ने लगी हूँ।
पंख भले छोटे हैं मेरे,
मगर हौसले आसमान से बड़े हैं—
मैं अपने सपनों के लिए
अब लड़ने लगी हूँ।

मेरे सपनों पर पहरे थे,
मेरी इच्छाओं पर बंदिशें थीं,
मगर मेरी आँखों में
एक ऐसा आसमान था,
जिसे कोई कैद नहीं कर सकता था।

मैं गिरूँगी तो उठूँगी,
टूटूँगी तो जुड़ूँगी,
हार अगर मिली भी कभी,
तो हार को हराकर ही रुकूँगी।
 
2 महीने पहले
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