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दरिया का रुख़ मोड़ने की हिम्मत मत करना

Jagdish chandra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बादल बनकर कुछ दिन आसमाँ में छा कर रहेगा,
        
                                                    
                            
पानी है, तो आखिर समंदर में जा कर रहेगा।

भँवर में कब से हम पतवार लेकर बैठे हैं,
हौसला है, तो यही पानी बचाकर रहेगा।

नदी किनारे घर बनाने का अपना फ़ायदा है,
चिंगारी जो भड़की, यही पानी बुझाकर रहेगा।

दरिया का रुख़ मोड़ने की हिम्मत मत करना,
अपने पे आया, तो यही पानी सैलाब बनकर रहेगा।

ताजवालों! झोपड़ी को कमज़ोर मत समझना,
जहाँ गुरूर सिर चढ़ा, ये पानी झुकाकर रहेगा।

कतरों को नाजुक समझने की ख़ता मत करना,
कतरा-कतरा मिल गया, तो समंदर बनकर रहेगा।

पत्थरों की ज़िद से दरिया कभी रुकता नहीं,
रास्ता न मिला, तो सीना चीरकर रहेगा।

'जगदीश', पानी से दुश्मनी कभी अच्छी नहीं होती,
जो ज़िंदगी देता है, वही नामोनिशाँ मिटाकर रहेगा।
-जगदीश चंद्र कापड़ी
2 महीने पहले
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