बहुत कुछ है मेरे पास, मगर कमी तेरी है,
हँसी चेहरे पे है, आँखों में नमी तेरी है।
लोग कहते हैं—भूल जा उसे, क्या पता उन्हें,
मेरी हर साँस में अब भी कमी तेरी है।
महफ़िलें हैं, लोग हैं, फिर भी अकेला हूँ,
कैसे बताऊँ उन्हें—मैं आज भी तेरा हूँ।
वक्त ने जो दर्द दिया, हँसकर सब झेला हूँ,
दुनिया समझे जो भी, मैं तो बस तेरा हूँ।
काश! फिर एक बार तुमसे मुलाकात हो जाए,
जो अधूरी रह गई थी, वो बात हो जाए।
मैं कुछ न कहूँ, तू भी खामोश रहे मगर,
आँख से आँख मिल जाए, किताब हो जाए।
-जगदीश चंद्र कापड़ी