आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मुक्तक (कापड़ी के)

                
                                                         
                            बहुत कुछ है मेरे पास, मगर कमी तेरी है,
                                                                 
                            
हँसी चेहरे पे है, आँखों में नमी तेरी है।
लोग कहते हैं—भूल जा उसे, क्या पता उन्हें,
मेरी हर साँस में अब भी कमी तेरी है।

महफ़िलें हैं, लोग हैं, फिर भी अकेला हूँ,
कैसे बताऊँ उन्हें—मैं आज भी तेरा हूँ।
वक्त ने जो दर्द दिया, हँसकर सब झेला हूँ,
दुनिया समझे जो भी, मैं तो बस तेरा हूँ।

काश! फिर एक बार तुमसे मुलाकात हो जाए,
जो अधूरी रह गई थी, वो बात हो जाए।
मैं कुछ न कहूँ, तू भी खामोश रहे मगर,
आँख से आँख मिल जाए, किताब हो जाए।
-जगदीश चंद्र कापड़ी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर