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हक़ जब कर्तव्य से कोसों दूर हुआ

Jagdish chandra

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                            देहरादून की भीड़, धक्कों का मेला,
        
                                                    
                            
हर चेहरा लगता था दर्द का रेला।
ठसाठस भरी बस, पिथौरागढ़ का सफ़र,
साँसों पर पहरा, गर्मी का कहर।

कंधों से कंधे, बदन से बदन थे,
अपने ही सफ़र में सभी मगन थे।
कोई पसीने में, कोई परेशानी में,
कोई ज़िंदा था अपनी ही कहानी में।

नज़र पड़ी तो एक बूढ़ा बैठा था,
वक़्त की ठोकरों से टूटा बैठा था।
नन्हा-सा बच्चा सहारा देता,
"महिला सीट" पर बैठे बाबा को दिलासा देता।

हर झटका कहर बन जाता,
दर्द भरा सफ़र बन जाता।
बस रुकी तो गूँज बनी एक आवाज़,
"क्या महिला सीट खाली करवाई आज?"

कानून का डंका ज़ोर से बजा,
खलासी को धमकाकर उसने कहा—
"उठ रे बाबा ये सीट है हमारी"
आई हो जैसे हक़ की महारानी।

बाबा उठे, पर कमर न उठी,
उम्र उठी, मगर नज़र न उठी।
हाथ में लाठी, आँखों में सीलन,
भीड़ देखती केवल, अर्धमृत जीवन।

बैठते ही उसने आईफ़ोन निकाला,
मोबाइल के कैमरे में चेहरा सँवारा।
सीट बच गई, इंसान हार गया,
महिला जीत गई, समाज हार गया।

हक़ जब कर्तव्य से कोसों दूर हुआ,
तब हर कमज़ोर इंसान मजबूर हुआ।
याद रखो, अधिकार तभी सम्मानित है,
जब उसमें मानवता भी शामिल है।
-जगदीश चन्द्र कापड़ी
2 महीने पहले
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