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दो गज जमीं

Jagdish chandra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आसमां को नीचे पड़ा, धरा को खड़ा देखा।
        
                                                    
                            
अलट-पलट होते हुए मैंने एक शादीशुदा देखा।

मुझे खुद चलना है, अपनी तरफ मत खींचो।
आसरा लेने वाला मैंने अक्सर गुमशुदा देखा।

पत्थर समझकर दुनिया ने ठुकराया जिसे।
रफ्ता-रफ्ता तराशा मैंने, तो खुदा देखा।

हर किताब का, हर पन्ने का आखिरी सफा देखा।
हंसते चेहरे में बहते दर्द का दरिया देखा।

दो मुट्ठी राख मिला या दो गज जमीं मिली।
फिर भी बात-बात पर भाई-भाई का झगड़ा देखा।
-जगदीश चंद्र कापड़ी
2 महीने पहले
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