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भगवान कहाँ है?

Jagdish chandra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कहाँ है भगवान?
        
                                                    
                            
मुझे कुछ समझ नहीं आया,
जब भी हरिद्वार और ऋषिकेश
घूमकर वापस आया।

मंदिरों में सिर झुकाया,
घंटियाँ बजाईं, दीप जलाया,
गंगा में डुबकी लगाकर भी
मन को कोई उत्तर नहीं आया।

एक दिन चलती गाड़ी से
एक बच्ची नीचे गिरने लगी,
मैंने दौड़कर उसे थाम लिया,
उसकी जान बच गई।

उसकी आँखों में डर देखा,
तो मेरा दिल भी भर आया।
जब उसे सुरक्षित घर पहुँचाया,
उसने मुस्कुराकर मुझे देखा।

उसकी माँ ने मुझे धन्यवाद कहा,
बच्ची को सीने से लगाकर,
रोते-रोते मुझे देखा।
सच कहूँ, उस एक पल में,
मैंने भगवान को अपने भीतर देखा।

तब समझ आया—
भगवान पत्थर की मूर्ति में ही नहीं,
हर धड़कते दिल में रहता है,
किसी की मदद करने वाला हाथ
ही शायद उसकी पूजा करता है।

भूखे को रोटी दे दो,
प्यासे को पानी पिला दो,
गिरते हुए को हाथ दे दो,
किसी रोते को हँसा दो।

फिर मंदिर जाने की क्या जरूरत,
जब इंसान अपने भीतर इंसानियत जगाता है।
जहाँ किसी के काम इंसान आ जाए,
शायद भगवान वहीं मिल जाता है।
— जगदीश चंद्र
एक महीने पहले
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