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अमीर कैसे बनें

Jagdish chandra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रवायतों की लक्ष्मण-रेखा से आज़ाद हो गए,
        
                                                    
                            
नए-पुराने सारे सबक हमें अब याद हो गए।

हम देखने गए थे कि बर्बाद कितने हैं,
उन्हें देखते-देखते हम ही बर्बाद हो गए।

चाँद पर पहुँचकर भी खुश नहीं हैं कुछ लोग,
हमने पानी में चाँद देखा, फ़रहाद हो गए।

किस्मत के हेर-फेर का धंधा भी खूब है,
मैं उस्ताद था जिनका, वो मेरे उस्ताद हो गए।

अमीर कैसे बने—ये सबक जिन्हें सिखाता रहा,
मैं वहीं का वहीं रहा, वो आबाद हो गए।

मेरे साथ चलने की कसमें खाते थे, जो कल तक,
वक़्त बदला तो वही लोग मेरे ख़िलाफ़ हो गए।

जिन्हें आइना दिखाया, वो आईना ही तोड़ गए,
चेहरे में दाग उनके थे, हम बदनाम हो गए।
-जगदीश चन्द्र कापड़ी
2 महीने पहले
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