याद आई चारपाई, जब ज़मीन से रिश्ता था,
तख़्त नहीं, मगर नींद में शाही सुकून था।
न था मेमोरी फोम, न कूल जेल तकिया,
फिर भी सवेरे हड्डियाँ मुस्कुरा उठती थीं।
चारपाई के नीचे रखे जूते, बासी सपनों के पहरेदार,
और ऊपर चादर में लिपटी मामूली सी गरिमा।
आजकल गद्दों में बसी है सुविधा की साज़िश,
पर नींद कहीं भाग गई है, शायद चारपाई पर ही सो रही हो।
धनी बेड पर खर्राटे लेता है, गरीब करवटें बदलता है,
फर्क़ सिर्फ़ गद्दे का नहीं, सोच का भी है।
तब चारपाई पर दादी की कहानियाँ बिछती थीं,
अब मोबाइल की स्क्रीन नींद निगल जाती है।
सिर्फ़ पीठ ही सीधी नहीं होती थी चारपाई पर,
बल्कि रिश्तों की डोर भी मज़बूत होती थी।
आज वो लकड़ी, वो पटरे, वो रस्सी नहीं मिलती,
चारपाई नहीं रही… और शायद हम भी नहीं रहे।
-इस्लाम अली