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अमावस्या की अंधेरी रात

Islam Ali

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अमावस्या की अँधेरी रात थी
        
                                                    
                            
मेरे लिए लाई एक सौगात थी

जगमग जगमग करते नीले अम्बर ने
अपनी ओर खींचा था मेरा ध्यान
नीला अम्बर ऐसे सुशोभित हो रहा था मानो
दुल्हन ने धारण किया हो हीरा जड़ित परिधान

अम्बर में टिमटिमाते आकाशगंगा के छोटे-छोटे तारे
ऐसे लग रहे थे मानो अम्बर में हों प्रकाश के फव्वारे

टूटते तारों ने की आकर्षक चिंगारियों की बौछार
मैं यह मनोहर दृश्य देखने को पहले से था तैयार
तारे टूटकर खो रहे थे अपनी-अपनी पहचान
अम्बर बिन तारे नहीं अम्बर ही है इनका जहान

उगते भानु की लालिमा जब अम्बर पर पसर गई
तब मुझको मालूम हुआ रजनी कब की गुजर गई

- इस्लाम अली,हरिद्वार
2 वर्ष पहले
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