श्वेत वर्ण पंख वाला सुंदर विहग एक, दुबका पड़ा है देखो बालक के पास में।
सुबक रहा है किसी दुख में व पीड़ा में वो, जाना नहीं चाहता है अपने विनाश में।
नीले हैं वसन जाके बालक वो दयावान, फेर रहा कर शीश मान उसे खास में।
कोमलता तन मन दोनों पे विराजमान, यही देख पंछी यह बँध गया आस में।
-इन्द्र प्रसाद लोधी 'रत्नेश'