रायता देख फैला हुआ जिंदगी में भला भी यहाँ है नहीं हो रहा।
बोलिए क्या करूँ ये दशा तो बड़ी खौफ से है भरी धैर्य हूँ खो रहा।
देखता ही नहीं मित्र कोई मुझे बुद्धि मेरी गई मैं खड़ा रो रहा।
चाल बेकार पूरी हुई देखिए भाग्य भी है हमारा पड़ा सो रहा।
-इन्द्र प्रसाद लोधी 'रत्नेश'