विज्ञापन

नाच नचावत

Indra Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मोहन ग्वालन बालन के सँग जाइ कबौ मिलि गाय चरावत।
        
                                                    
                            
फोड़त हैं मटकी कबहूँ कबहूँ घर माखन जाय चुरावत।
डार कदंबन बैठि कबौ सबके सँग में मिलि बेनु बजावत।
सूरज की तनया तट पै कबहूँ सब गोपिन नाच नचावत।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
13 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Bajrang Lal

19 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

12655 कविताएं

View Profile

SATYENDRA KUMAR

133 कविताएं

View Profile