तानसेन छेड़ि दिए जानो हैं मल्हार रागु, घिरि आए नभ माहिं काले काले बदरा।
गरजि गरजि सुर ताल का मिलाय रहे, चपला चमकि रही मानो लाल अँचरा।
कूकि रही कोयलिया अमवा की डार बीच, मानो डरपत देखि देखि वाको जियरा।
नर नारी बाल वृद्ध देखि कै प्रसन्न अति, मानो घन नाहीं काला धनु कहूँ निकरा।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'