आसन पंकज श्वेत सुशोभित पुस्तक हस्त लिए गुणधामी।
वस्त्र सुशोभित हैं तन श्वेत मरालहु श्वेत सदा विचरामी।
ज्ञान व शब्दन की निधि पास बने सबही तुमरे अनुगामी।
मातु कृपा करिए मुझ पै पद पंकज माहि नमामि नमामी।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'