झूमि रहा कलुआ अतना जनु पाय बयारि भए बिरवा।
लागि रहा चढ़ि गै वहि के वहु फाँदि गवै बहतै नरवा।
पाँवन की गति को बरनै सब काँटन फाटि गए तरवा।
लोग लुगाइ कहैं सबहीं यहु बात सुनै न कबौ सरवा।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'