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निछावर है जिस पर जिस पर दिल जान

Indra Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नहीं धरा का टुकड़ा कोई है जगती की शान।
        
                                                    
                            
अलौकिक अपना हिंदुस्तान।
निछावर है जिस पर जिस पर दिल जान।

ऋषियों मुनियों की धरती है ये देवों के स्थान यहाँ।
हिमगिरि जिसकी रक्षा करता, प्रहरी-सा धर ध्यान यहाँ।
सागर चरण पखार बढ़ाता रहता अपना मान यहाँ।
कुटुम्बकम वसुधैव रहा है जिसका सुंदर गान।।१॥

बलहीनों को धनहीनों को हमने नहीं सताया।
स्वर्णमयी लंका जीती पर उसको भी लौटाया।
राह धर्म की चले सदा उस पर ही सब कुछ पाया।
दुखी पड़ोसी देख कभी ना सोए चादर तान।।२॥

तम से ग्रसित धरा को हमने ही तम हीन किया है।
सभी सुखी हों सभी निरोगी हमने मंत्र जिया है।
सबका संकट हरने को हमने ही गरल पिया है।
हमने ही नारी को पूजा दे पूरा सम्मान।।३॥

वीरों का इतिहास यहाँ पर भी अद्वितीय रहा है।
दानवीर बलि ने सब देकर भी कुछ नहीं कहा है।
हम जिस ओर चले सारा जग भी उस ओर बहा है।
यहीं हुए 'रत्नेश' शब्द पर चलने वाले बान।।४॥
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
3 महीने पहले
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