भारत मा अँगरेज भए कुछ लोग नहीं जिन आवत हिंदी।
शुद्ध नहीं अँगरेजिनि आवति ना सरऊ पढ़ि पावत हिंदी।
बाप चराइन भैंसि सदा उनके मुँहि ते गरियावत हिंदी।
सूर कबीर रहीम सदा तुलसी जस का दुलरावत हिंदी।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'