हार हरा दिखलाय रहा यह दृष्टि जहाँ तक आपुहिं जावै।
धान खड़ा लहराय रहा कुछ बात कहै सुनि मूड़ु हलावै।
चूनरि ओढ़ि लियो वसुधा हरियारिपना बस रंगु दिखावै।
देखि छटा यहि भाँति कहै मन माह प्रभो बसि सावन आवै।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'