लागि रहा यहु है बिजुरी बनु तार कसे बसि हैं नभ माहीं।
अंबर नील भले यहु लागत पै बिरवा जस लागि सुखाहीं।
है यहु दृश्य विकास भरा जिहिमा जड़ता सिगरी बस आहीं।
लाल किहे तनु देखि रहा नभु मोहिं चही यह उन्नति नाहीं।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'