हिंदी का है बढ़ रहा, आज विश्व में मान।
पढ़ना लिखना एक-सा, है इसकी पहचान।
है इसकी पहचान देव वाणी की तनया।
वीरोचित गंभीर और रहती है विनया।
सेवा में 'रत्नेश' सदा इसके है चिंदी।
सुनो गुनो पढ़ बोल राष्ट्र की भाषा हिंदी।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'