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बरखा की पहुनाई

Indra Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बरखा की करने पहुनाई।
        
                                                    
                            
वल्लरी निकलकर मुसुकाई।

आधा अषाढ़ जैसे बीता।
बारिश ने काट दिया फीता।
बूँदा बाँदी फिर पड़न लगी।
ऊमस भी अपने आप जगी।
धरती पुत्रों के मन झूमे।
खेतों में हल लेकर घूमें।
धानों की बेढ़ उखड़ आई।।१॥

मेड़ें मजबूत भईं सारी।
खेतों में पहुँचे नर नारी।
काले काले मेघा छाए।
सबके मन भी अति हरषाए।
काले मेघा पानी दे दो।
काले मेघा पानी दे दो।
ये गीत लड़ी मुख पर छाई।।२॥

बादल भी गरज-गरज बरसे।
सबके तन मन अतिशय हरषे।
खेतों में धान लगे सारे।
अब के होंगे वारे न्यारे।
है कृषक मनों में बात यही।
जैसे मन वैसे दिखे मही।
दोनों पर दिखती हरियाई।।३॥

वृक्षारोपण के काम बढ़े।
दादुर ने सुंदर मंत्र पढ़े।
सड़कें गलियाँ हैं धुली हुई।
मुरझाई बैठी छुई-मुई।
सब पर हरियाली है गाढ़ी।
लतिका रत्नेश दिखे बाढ़ी।
ये है यौवन की अँगड़ाई।।४॥
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
3 महीने पहले
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