तारक वृंद छिपे नभ में अँधियार हुआ शशि जोति लुकाए।
मोद किसान भरे सब अंग उछाह बढ़ा मन हैं हरषाए।
दादुर बोलि रहे सुर में पुरवा बिरवा सब देत झुकाए।
गाय रही वसुधा तकि कै नभ ओ सखि री लखु बादल आए।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'