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बादल आए

Indra Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तारक वृंद छिपे नभ में अँधियार हुआ शशि जोति लुकाए।
        
                                                    
                            
मोद किसान भरे सब अंग उछाह बढ़ा मन हैं हरषाए।
दादुर बोलि रहे सुर में पुरवा बिरवा सब देत झुकाए।
गाय रही वसुधा तकि कै नभ ओ सखि री लखु बादल आए।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
3 महीने पहले
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