विज्ञापन

नहीं किसी पर कोई भरोसा

Imtiyaz Raza Ali Khan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नहीं किसी पर कोई भरोसा, बिका है कानू, बिकी अदालत,
        
                                                    
                            
यहाँ सियासत के हाथ बिकती हर एक सच की हसीं इबारत।

गरीब रोता है बंद कमरों में अपने हिस्से की रौशनी को,
अमीर के घर में रात भर चलती रहती झूठों की ही तिजारत।

वही अकेला खड़ा मिलेगा जो सच लिखेगा ज़माने भर में
यहाँ तो डर के मकान ऊँचे, कि कितनी छोटी हुई बगावत।

किसी के चेहरे पे मुस्कुराहट, किसी के दिल पे हैं ज़ख्म यारों
ये कैसा मौसम बना दिया है, बची न इंसां की अब अमानत।

“रज़ा भी अब है कलम उठाए हुए है सच की लड़ाई में भी
उसे यक़ीं है बदल ही देगी कि एक दिन जागती बगावत।
-इम्तियाज़ रज़ा अली खान
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all