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झुकाता ही कौन है

Imtiyaz Raza Ali Khan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दुनिया की अदाओं को समझता ही कौन है।
        
                                                    
                            
एक बार समझ जाये भटकता ही कौन है।।
राहों में बिछाते रहे दुश्मन भी वो कांटे
चलते सफ़र में फ़िर यहाँ रुकता ही कौन है।।
इस प्रेम के सागर में उलझता ही कौन है।
एक बार उलझ जाये सुलझता ही कौन है।।
एक वादे पर गुज़ार दें हम उम्र ये सारी।
रखते हैं हम वो जज्बा रखता ही कौन है।।
अपनों से विरासत में हमें जोश है मिला
अब देखते हमको झुकाता ही कौन है।।
-इम्तियाज़ रज़ा
2 महीने पहले
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