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पोवारी को घाट अलौकिक से,ठाट बदलनो से

Historian 0.C.

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            पोवारी को घाट अलौकिक से, वोको ठाट बदलनो से।
        
                                                    
                            
भाषा की महिमा बढ़ावन, साहित्य को ठाट-बाट बदलनो से।।

जमानों बदल रहीं से,आमरी भाषा भी त् बदलें।
प्रासंगिक सुधारों को बिना, भाषा कशी टिके ?
भाषा को घाट अलौकिक से, वोको ठाट बदलनो से।
भाषा की महिमा बढ़ावन, साहित्य को ठाट-बाट बदलनो से।।

सकल सृष्टि मा,हर वस्तु निरंतर बदल रहीं से।
नियति बड़ी बलवान से, भाषा कसी नहीं बदले?
भाषा को घाट अलौकिक से,वोको ठाट बदलनो से।
भाषा की महिमा बढ़ावन, साहित्य को ठाट-बाट बदलनो से।।

मातृभाषा धरोहर से, वोको घाट वोकी आत्मा वानी से।
भाषा की आत्मा बचावनो से, भाषा को जतन करनो से।
भाषा को घाट अलौकिक से,वोको ठाट बदलनो से।
भाषा की महिमा बढ़ावन, साहित्य को ठाट-बाट बदलनो से।।

शब्द संपदा बढ़ायके, भाषा को गौरव बढ़ावनो से।
संपूर्ण भारत मा आता, भाषा को सौरभ बिखेरनो से।
भाषा को घाट अलौकिक से,वोको ठाट बदलनो से।
भाषा की महिमा बढ़ावन, साहित्य को ठाट-बाट बदलनो।।

मानबिंदू घाट ला मान के,भाषा को घाट बचावनो से।
आपली वाणी विकसित करके, वोको मान बढ़ावनो से।
भाषा को घाट अलौकिक से,वोको ठाट बदलनो से।
भाषा की महिमा बढ़ावन, साहित्य को ठाट-बाट बदलनो से।।

घाट बदलनो मा प्राणहानी,ठाट बदलनो मा कल्याण से।
भाषा को ठाट बदलके, भाषा को उत्थान करनो से।
भाषा को घाट अलौकिक से,वोको ठाट बदलनो से।
भाषा की महिमा बढ़ावन, साहित्य को ठाट-बाट बदलनो से।।

नवों जमानों मा, भाषा को गौरव बढ़ावनो से।
संपूर्ण भारत मा, भाषा को सौरभ बिखरनो से।
भाषा को घाट अलौकिक से,वोको ठाट बदलनो से।
भाषा की महिमा बढ़ावन, साहित्य को ठाट-बाट बदलनो से।।

-ओ सी पटले
एक घंटा पहले
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