खिले कलियां आए बसंत जब तुम्हारी हंसी गूंजे,
जो तुम गुजरो शहर से तो महके सारे गली कूचे।
तुम गुज़रो उन गलियों से, आज़ाद और बेखौफ़ चिड़िया की तरह
और उड़ो क्षितिज की तरफ उसे छूने की चाह लिए,
तुम्हारे चेहरे की चमक बरकरार रहे तारों की दुनिया की तरह।
हम मिले किसी शाम में, बैठे हो हाथ में चाय लिए,
टूटते तारे से मांगे मुराद, मजबूत दोस्ती की चाह लिए।
हर संभव हम करे प्रयास , “रखता है प्रयास मायने”
तुम अपनी मंजिल की तरफ बढ़ो, दिल में धूमकेतु सी आग लिए।
तुम चलती जाओ अनंत की तरफ आंखो में सपनों को बांधे,
जैसे चावला की कल्पना पहुंची सितारों के आगे।