चाहा तो बहुत
पूंछ लूँ उसके,
आँसुओं का सबब।
गले लगाकर ,
सुनूँ भीतर का शोर।
या कंधे पर सिर रख,
बाँट लूँ उसकी ख़ामोशी।
पर.....
कुछ दर्द ऐसे होते हैं,
जिन्हें छूने की चाह में भी
हम छू नहीं पाते।
– हेमंत