ये मस्जिद, ये मंदिर, ये मकां क्या है,
दिल में गर दर्द नहीं, तो फिर जहाँ क्या है।
पाप और पुण्य की तुम बात करते हो सदा,
इस खुदगर्ज दुनिया में ये इम्तिहाँ क्या है।
डरते हो जिसे तुम नरक की आग कहकर,
जिंदगी से बदतर भला कोई धुआँ क्या है।
ढूँढते हो जिसे तुम जन्नत की वादियों में,
सुकून-ए-दिल के सिवा वो रवां क्या है।
मशरूफ हैं सब यहाँ चेहरे बदलने में
नकाब हटाकर देखो तो इंसाँ क्या है।
किताबों में लिखा जो, बस वही सच मान बैठे,
रूह की आवाज़ से बढ़कर बयां क्या है।
जो हर लम्हा तड़पती हो सुकूँ की आस में,
जीने से बढ़कर यहाँ सज़ा क्या है।
अदालत लगी है यहाँ हर एक मोड़ पर,
खुद गुनाहगार हैं, पूछते हैं गुनाह क्या है।
सिकुड़ रही है दुनिया इस मतलबी दौर में,
मगर ये वजूद का फैलता आसमाँ क्या है।
तलाशते हैं सब यहाँ जन्नत का कोई रास्ता,
जो भूखे को रोटी न दे, वो यहाँ क्या है।
राख हो जाना है आखिर में एक रोज़ 'हेमंत'
फिर इस मिट्टी के पुतले में रखा क्या है।
रायगढ़, छत्तीसगढ़