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एक अधूरा सवाल

Harshita Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वनवास राम का था, पर सीता भी साथ चलीं,
        
                                                    
                            
सुख छोड़कर वो दुखों की राह पर ढलीं।
अग्नि-परीक्षा देकर उन्होंने,
अपनी पवित्रता को साबित किया l
पर एक सवाल आज भी चुभता है-
जब सीता का त्याग हुआ, तो राम साथ क्यों न गए?
क्या वो इतनी साहसी थीं कि
दो बच्चों के साथ अपनी अलग ही दुनिया बसा लीं
या इतनी थक चुकी थीं कि
खामोशी से धरती में समा जाना ही ठीक समझा?
राम ने हर बार त्याग किया
पिता के वचनों के सम्मान में सिंहासन छोड़ा,
और प्रजा के सवालों पर
अपनी पत्नी और बच्चों से नाता तोड़ा।
पर क्या सीता का त्याग छोटा था?-
कभी पति के साथ के लिए राजसी सुख का त्याग किया
तो कभी पति के सम्मान के लिए अपने वजूद को ही भुला दिया।
जब वो सह न सकीं
कि पिता और बच्चों की दूरी रहें,
तो खुद को मिटा दिया ताकि मिल जाए बच्चों को उनके पिता का प्यार
पर एक बात अब भी अधूरी है—
वो राम का मोह कभी छोड़ क्यों न सकीं?
आज की सीता
शायद वनवास भी खुद चुन लेना चाहती है
पर बार-बार परीक्षा देना मंजूर नहीं उसे।
वो अपने बच्चों को अपने कंधों पर पालती,
उन्हें किसी के नाम का मोहताज न बनाती।
वो लोगों के तानों से डरकर,
अपना रास्ता कभी न बदलती।
वो चाहती है
कि इस बार त्याग राम भी करें,
हर बार हारना सिर्फ सीता के हिस्से क्यों आए?
और अब जब वो—
अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेती है,
सिर्फ दूसरों को खुश करने के लिए
खुद को मिटाना नहीं चाहती है
तो दुनिया उस पर इतने सवाल क्यों उठाती है?
2 महीने पहले
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