।।जय माता दी।।
अष्टभुजाओं वाली माता, सम्पूर्ण जगत हो देख रही।
स्वागत में तेरी माता, भजनों की रंगत है बढ़ी।।
प्रथम रूप शैल पुत्री तुम्हारा, द्वितीय ब्रह्म चारिणी।
मिटाओ अंधकार जग का, तुम ही जगत उद्धारिणी।।
तृतीय रूप चंद्रघंटा तुम्हारा, चतुर्थ रूप कुष्मांडा देवी।
पाप मिटाया तुमने धारा से,स्थापित की धर्म की वेदी।।
पंचम रूप सुहावे स्कन्दमाता, सष्ठमी तुम कात्यायनी।
दूर करो अंधकार अज्ञान का, हे माँ ज्ञानदायिनी।।
सप्तम रूप कालरात्रि माता, अष्टमी बने महागौरी ।
नवरात्रों में नौं दिन माता, हम उगाते घर में हरियाली जौ की।।
नौ देवियों में प्रशिद्ध है माता,नवरूप तुमारा सिद्धिदात्री।
दुष्टों का संहार किया , उठाये अस्त्र होकर इक स्त्री।।
अष्टभुजाओं वाली माता, सम्पूर्ण जगत हो देख रही।
स्वागत में तेरी माता, भजनों की रंगत है बढ़ी।।
स्वरचित
हरीश चमोली "दीक्षार्ष"
टिहरी गढ़वाल
उत्तराखंड
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