विज्ञापन

तुम कैसी हो

Harikesh Yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मुझको मिलती हैं ख़बरें भारत-चीन झड़प की
        
                                                    
                            
मुझको ही ख़बर नहीं मिलती है तेरे तड़प की

हृदयपुष्प खिले थे मेरे , अब क्यों हैं मुरझाए ?
सुख से भी सूखा है हृदय मेरा, कौन मुझे बहलाए?

तुम कैसी हो ? ज़रा मुझे बतलाना
मैं अब जा रहा हूं ,आख़िरी बार मिलने चली आना

तुम जीवन में मेरे साथ न्याय नहीं कर पायी
उलझी हैं जुल्फ़ें तेरी,आख़िर तुम किससे मिलकर चली आयी ?

शून्य क्षितिज पर चलनेवाले
मेरे प्यार से जलनेवाले

पूंछ रहे हैं मुझसे ,"तुम कैसी हो?"
बताने के लिए ही बता दो ," तुम कैसी हो?"

हरिकेश यादव काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
वाराणसी शिवपाल अम्बेडकर नगर
समर्पित - डिम्पल यादव

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all