अगर तेरी सदाएं मुझ तक आती
तो मैं उनसे तेरे हालत पूछता
किससे पूंछू कि इन हालातों की पटकथा किसने लिखी
जिसमें ज़लालत के सिवा कुछ भी न था
अब तेरे जाने के गम में
मेरे दर्द का आकार इतना बढ़ गया है
कि मेरे शब्दों का संसार छोटा पड़ रहा है
मेरे ही शब्द मेरे भावों से लड़ रहे हैं
न तुम पढ़ रहे हो और न ही लोग पढ़ रहे हैं
हरिकेश यादव
काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी
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