पहली नजर में ही उलझकर रह गया था मैं
आंखों में तेरी डूबकर बह गया था मैं
था मैं तेरी अदाओं का अनुरागी
प्यार को मेरे कह बैठी तुम नाटकबाजी
अब इश्क़ है तू किसी और का
लड़का है शायद किसी मौर्य का
जब जब तेरे बदन को अपने बदन से सटाया
तब तब तूने मेरे प्यार को नाटक बताया
मुझको नाटकबाज कहकर के तू खुद ही नाटकबाजी करती थी
रात के अंधेरे में बुला बुलाकर उसको तू फाटकबाजी करती थी
हरिकेश यादव काशी
हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी शिवपाल अम्बेडकर नगर
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें