कैसे बताऊं तुम्हें?
कैसे समझाऊं तुम्हें?
कैसे दिखाऊं तुम्हें?
कि मेरे हालात क्या हैं?
अब मेरी आंखों में सिर्फ इंतज़ार है तुम्हारा
तुम नहीं आओगी जानता हूं मैं
फिर भी क्यों इंतज़ार है तुम्हारा ?
शायद यह भी प्यार का एक तरीका हो
आख़िर क्यों चले गए तुम ?
जब तुम कहते थे "अच्छा जी"
तो कितना अच्छा लगता था!
मेरा जीवन कितना सच्चा लगता था!
कैसे बुलाऊं तुम्हें?
अब
ख़ुद ही चले आओ न
हरिकेश यादव
काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी
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