जीवन के सच को जाना मैने
हार-हार पहचाना मैंने
समय के रथ ने घेरा है
राह में बहुत अंधेरा है
व्याघातो के इस मन मे
टूटे सपने क्षण भर में
उपहासों का दौर है जारी
अस्मत बचाना है बड़ा भारी
यातनाओं का सूर्य उगा है सर पर
किरणे खेलती अपने ही नभ पर
आदमकद दर्द बसा है सीने में
आनंद कहां बिना कष्ट जीने में
"क्या अधूरा गीत गा जाऊंगा
ना ना फिर से राग मिला ऊंगा
क्या आधा लिखा मिटाऊंगा
ना ना फिर से कलम उठाऊंगा
क्या सपनों का सेतु बांधूगा
ना ना सच का मंजर लाऊंगा"